Tuesday, November 18, 2014

दोहा

जिनके उर न छल-कपट, घृणा न द्वेष अहन्त!
वे ही ईश्वर रूप हैं, सविता, बालक, सन्त!!

                              - रोहित श्रीवास्तव "अथर्व"

दीवाली

समर्पित जब सकल जीवन तो फिर मान क्यों सवाली है?
कि क्यों दिल के किसी कोने में अब भी रात काली है?
हृदय में प्रेम दृढ़ विश्वास के गर दीप जल जाएँ,
तो जीवन की हरेक मावस दीवाली ही दीवाली है!

                                    - रोहित श्रीवास्तव "अथर्व"