Tuesday, November 18, 2014

दोहा

जिनके उर न छल-कपट, घृणा न द्वेष अहन्त!
वे ही ईश्वर रूप हैं, सविता, बालक, सन्त!!

                              - रोहित श्रीवास्तव "अथर्व"

दीवाली

समर्पित जब सकल जीवन तो फिर मान क्यों सवाली है?
कि क्यों दिल के किसी कोने में अब भी रात काली है?
हृदय में प्रेम दृढ़ विश्वास के गर दीप जल जाएँ,
तो जीवन की हरेक मावस दीवाली ही दीवाली है!

                                    - रोहित श्रीवास्तव "अथर्व"

Wednesday, January 20, 2010

वसंत पर्व पर...

शुभ वासन्ती पर्व है, अनुपम अवसर ज्वार,
संयम, सेवा, साधना, सुविचारी पतवार!
इसे थामकर जो चलें, बाँटें जग को प्रीत,
वे ही पाते प्यार गुरु का, तरते सागर पार!!

- रोहित श्रीवास्तव 'अथर्व'

Monday, December 7, 2009

Let's Go Green..!!

एक दिन मेरी माँ ने पूछा, बेटा क्यूँ मुझे सताते हो?
तुम सबसे प्यारे बच्चे हो, फिर भी क्यूँ समझ न पाते हो?

मैं तुम्हें सदा दुलराती हूँ, अपनी ममता के आँचल से!
सूरज की नज़र बचाने, ढकती हूँ ओज़ोन के काजल से!!
पर तुम अपनी नादानी में, बच्चों सी इस शैतानी में,
अपने ही नन्हे हाथों से, क्यूँ उसको पोंछ मिटाते हो?
बेटा क्यूँ मुझे सताते हो?

तरु रूप में तुमको भाई दिए, ये तुम्हें सदा दुलराएँगे!
तुमको डाली की गोद बिठाकर, शीतलता बरसाएँगे!!
तुमने फल खाए बागों में, खेले इनके संग फागों में,
फिर आज भूलकर सब नाते, तुम क्यूँ इनको कटवाते हो?
बेटा क्यूँ मुझे सताते हो?

वे ही तो सच्चे पालक थे, जो प्राणवायु नित देते थे!
है याद? वो दुख में गले लगाकर, जी हल्का कर देते थे!!
उस अभिभावक को तुम खोकर, बतलाते हो क्यूँ रो-रोकर?
मरकर उनने न आह भरी, तुम जीते-जी चिल्लाते हो!
बेटा क्यूँ मुझे सताते हो?

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माँ आज रुष्ट है हम सबसे, उत्पीड़न झेल रही कब से!
उसको खुशियाँ हैं लौटानी, अब फिर किरणों से, कलरव से!!
जो किया है हमने जीर्ण-शीर्ण, उसको करना होगा नवीन!
मिलकर सब करें प्रयास हरित, चिंतन बदलें ' Let's Go Green ' !!

- रोहित श्रीवास्तव "अथर्व"

Wednesday, November 18, 2009

गीत ऐसे गाओ...

आज मानव भाग्य भी रूठा हुआ है,
आज मानव धैर्य भी छूटा हुआ है!
गीत ऐसे गाओ साथी तुम सृजन के,
बज उठे फिर साज़ जो टूटा हुआ है!!

प्रगति और विज्ञान की अपनी है भाषा,
मनुज इनके संग होकर भी है प्यासा!
मात्र शिक्षा प्राप्त कर जो मर रहे हैं,
उन्हें विद्या-दान कर, हर लो पिपासा!!
ज्ञान की गंगा पुनः उन तक बहा दो,
लहलहा दो वृक्ष जो सूखा हुआ है!
गीत ऐसे गाओ...

आज फिर से है वही करुणा लुटानी,
पीर मानवता की फिर से है बँटानी!
प्रेम के, अपनत्व के अवतार हो तुम,
आज दोहरा दो पुनः 'गुरु' की कहानी!!
हृदय में सबके उतरकर खिलखिलाओ,
छलछला दो, पात्र जो फूटा हुआ है!
गीत ऐसे गाओ...

कर्म से सत्-प्रेरणा विस्तार करना,
हर अमावस को नया त्यौहार करना!
लोक के प्रतिकार का पीकर हलाहल,
संस्कृति से तुम सदा ही प्यार करना!!
शक्ति और सामर्थ्य पाओगे हृदय से,
'गुरु', पितासम ना कभी दूजा हुआ है!
गीत ऐसे गाओ...

- रोहित श्रीवास्तव "अथर्व"