आज मानव भाग्य भी रूठा हुआ है,
आज मानव धैर्य भी छूटा हुआ है!
गीत ऐसे गाओ साथी तुम सृजन के,
बज उठे फिर साज़ जो टूटा हुआ है!!
प्रगति और विज्ञान की अपनी है भाषा,
मनुज इनके संग होकर भी है प्यासा!
मात्र शिक्षा प्राप्त कर जो मर रहे हैं,
उन्हें विद्या-दान कर, हर लो पिपासा!!
ज्ञान की गंगा पुनः उन तक बहा दो,
लहलहा दो वृक्ष जो सूखा हुआ है!
गीत ऐसे गाओ...
आज फिर से है वही करुणा लुटानी,
पीर मानवता की फिर से है बँटानी!
प्रेम के, अपनत्व के अवतार हो तुम,
आज दोहरा दो पुनः 'गुरु' की कहानी!!
हृदय में सबके उतरकर खिलखिलाओ,
छलछला दो, पात्र जो फूटा हुआ है!
गीत ऐसे गाओ...
कर्म से सत्-प्रेरणा विस्तार करना,
हर अमावस को नया त्यौहार करना!
लोक के प्रतिकार का पीकर हलाहल,
संस्कृति से तुम सदा ही प्यार करना!!
शक्ति और सामर्थ्य पाओगे हृदय से,
'गुरु', पितासम ना कभी दूजा हुआ है!
गीत ऐसे गाओ...
- रोहित श्रीवास्तव "अथर्व"
यह सम्वत् प्रलयंकारी है
7 years ago

real song, true song, excellent explanation.
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