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Monday, February 16, 2009

‘तांडव-नर्तन’

कुपित वीणा है विचलित तान,
कुपित हर भ्रमर का गुंजन गान!

कुपित है हर मृदंग की थाप,
कुपित बैजू का स्वर आलाप!

कुपित है माँ का स्नेह दुलार,
कुपित और शुष्क मेघ-मल्हार!

कुपित सविता का स्वर्णिम ताप,
कुपित शिशु की कोमल पदचाप!

कुपित है सूर्य, कुपित है चंद्र,
कुपित हैं चौपाई और छंद!

कुपित कोकिल-पपीह के गीत,
कुपित मीरा के मन का मीत!

कुपित तरुओं का सहज विकास,
कुपित सरिता का चिर उल्लास!

कुपित है माताओं का मान,
कुपित हैं नववधू के अरमान!

कुपित है झांझर की झंकार,
कुपित ‘नूपुर’ की मधुर पुकार!

कुपित है प्रभु का सुमिरन गान,
कुपित हर चेहरे की ‘मुस्कान’!

कुपित है अंतस् का हर तार,
कुपित है तप्त रुधिर की धार!

कुपित सा निज स्वर है अनजान,
कुपित हैं मुझसे मेरे प्राण!!

अब और करूँ क्या व्यक्त, कुपित इस कलम-स्याह का कण-कण है,
मानव के मन में हर्ष नहीं, अब कुपित विचारों का रण है!
यह गरल-दृश्य, इस प्रलयकाल के, मानव-उर का दर्पण है,
यह भावनाओं का मर्दन है, महाकाल का ‘तांडव-नर्तन’ है!!

- रोहित श्रीवास्तव “अथर्व”