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Monday, February 16, 2009

कल मैंने एक सर्कस देखा…

नहीं समझ आया है आज भी, कोमल था या कर्कश देखा!
कल मैंने एक सर्कस देखा !!

जिस आयु में हमें दुलारा मात-पिता की गोद ने,
उसके सारे सावन छीने इस आमोद-प्रमोद ने!
कभी घरों को स्वर्ग बनाती थी जो नन्ही किलकारी,
किलकारी को कब्र बनाया कुटिल स्वार्थ ने लोभ ने!!
हँसी के इस श्मशान में व्यापक चीत्कार को बेबस देखा!
कल मैंने एक सर्कस देखा !!

एक पिता जिसकी थी पुत्री के विवाह की शुभ अभिलाषा,
आज द्वार तकती हैं आँखें, बेटी के आने की आशा!
जिसके तीक्ष्ण नयन-बाणों से, घायल थे कितने ही कतिपय,
किन्तु कोई भी समझ न पाया, उसके व्यथित ह्रदय की भाषा!!
उन्हीं क्षुब्ध निर्वात नयन में, तीर नहीं बस तरकश देखा!
कल मैंने एक सर्कस देखा!!

जिनके विचरण से गर्जन से, वन-उपवन शोभित होते,
जिनके सतत साथ रहने से मानव हैं निर्भय सोते!
जिनके कलरव ने प्रत्येक सुबह को सुखी बनाया है,
जिनके नृत्य मात्र से सुन्दर, मेघ प्रकट हर्षित होते!!
उनकी नम आँखों से बहते सिंहनाद को बरबस देखा!
कल मैंने एक सर्कस देखा !!

- रोहित श्रीवास्तव “अथर्व”